सुनो ,,
नदियों ....झरनो से जो प्रेम गिरता है ............और प्रकृति के कण- कण में समाहित हो जाता है ..........ठीक वैसे ही ..........मैंने पीया है तुम्हारा प्रेम ..........अपने अंजुरी में भर कर ..............सायद तुम अनजान हो ...........अनजान ही रह जाओ .........लेकिन तुम्हारे चमकते हुए चेहरे की लालिमा मेरा उगता सूर्य है.............तुम इसे मेरी माथे की बिंदिया भी मान सकते हो |
जो लोग धर्म रीती रिवाज की बात करते है ....................उन्होंने समझ ही नहीं प्रेम की भासा की ...................क्योकि प्रेम की भासा हमेसा ईश्वर द्वारा पढ़ी गयी है ..............इसलिए वो एक धुन है ................जो नदियों के कल -कल में ,, हवाओं के धीमी सरसराहट में ...........और पत्तो की खरखराहट में बसी हुई है |
प्रेम की भासा एक खुसबू है ..............जो फूलो की खुसबू में बसी हुई है ..............................और प्रकृति के कण -कण में
एक प्रेम गीत बज रहा है ...................
लेकिन मेरी कानो में जो जाता है .................वो सिर्फ तुम्हारा ही स्वर है ..............
मेरे लिए वही प्रेम गीत है ||
प्रिया मिश्रा :))

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