लिखना बहोत कुछ चाहती हूँ .........बताना भी बहोत कुछ चाहती हूँ ,,  लेकिन प्रमाड भी तो देना होता है ..........

वो कैसे दूँ तुम्हे ,,

मन गुब्बारों से उड़ता है,, फिर भी नहीं छू पाता तुम्हारे मन को ,, व्यथित मन है ,, प्रेम है,, जता नहीं सकते ,, और क्या कहें ..........
गुजर के एक दिन प्रमाड भी दे जायेंगे .........
ये
गुब्बारे  मेरे मन के ...............तुम तक कभी -ना कभी तो आएंगे ||

प्रिया मिश्रा :))  

 


 

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